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Date: 
04.02.2022
City: 
Lucknow

उन सभी उम्मीदवारों में, जिन्होंने उत्तर प्रदेश चुनावों के पहले दौर के लिए हलफनामे दाखिल किए हैं, लगभग 25 प्रतिशत के आपराधिक रिकॉर्ड्स हैं- ये खुलासा एक एनजीओ एसोसिएशन फॉर रिफॉर्म्स (एडीआर) की ओर से जारी आंकड़ों में किया गया है.

आंकड़ों में ये भी सामने आया कि उनमें से 20 प्रतिशत के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें हत्या, बलात्कार या हत्या का प्रयास शामिल हैं. बुधवार को एडीआर ने ये निष्कर्ष अपने इलेक्शन वॉच प्रोग्राम के तहत जारी किए.

एसोसिएशन ने कहा कि उसने 58 चुनाव क्षेत्रों में, उम्मीदवारों द्वारा दाखिल कुल 623 हलफनामों में से 615 का अध्ययन किया और उसने कहा कि सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां, ‘धन और बाहुबल वाले’ उम्मीदवारों को टिकट देती हैं, भले ही उनका रिकॉर्ड आपराधिक रहा हो. जहां अध्ययन किए गए 615 में से 156 उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं, वहीं 121 (20 प्रतिशत) ने घोषित किया है, वो हत्या, हत्या के प्रयास और रेप के मामलों में अभियुक्त हैं.

एनजीओ ने कहा कि ऐसा तब है जब सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति को ‘अपराधमुक्त’ करने के लिए बार-बार प्रयास किए हैं.

पिछले साल अगस्त में शीर्ष अदालत ने सभी राजनीतिक दलों को निर्देश दिया था कि अपने उम्मीदवारों के चयन के 48 घंटे के भीतर, उनका आपराधिक इतिहास प्रकाशित करें. उससे पहले भी फरवरी 2020 में, बिहार विधानसभा चुनावों से पहले, एससी ने सभी पार्टियों को निर्देश दिया था कि उम्मीदवारों का आपराधिक इतिहास अपनी वेबसाइट्स और सोशल मीडिया हैंडल्स पर प्रकाशित करें और समझाएं कि ऐसे उम्मीदवारों को टिकट क्यों दिए जा रहे हैं.

एडीआर को-ऑर्डिनेटर संतोष श्रीवास्तव ने दिप्रिंट से कहा कि कोई भी पार्टी सुप्रीम कोर्ट निर्देशों को गंभीरता से लेती नज़र नहीं आती. उन्होंने कहा, ‘सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवारों का धन और बाहुबल से जुड़ाव बना हुआ है. ये सब सुप्रीम कोर्ट निर्देशों के बावजूद हो रहा है’.

श्रीवास्तव ने आगे कहा कि पिछले साल एडीआर के एक विश्लेषण में पता चला था कि यूपी के 396 मौजूदा विधायकों में 35 प्रतिशत के खिलाफ अपराधिक मामले लंबित थे.

दिप्रिंट ने भी यूपी में कुछ राजनीतिक पार्टियों से संपर्क साधकर, एडीआर निष्कर्षों के बारे में उनकी प्रतिक्रिया का अंदाज़ा लगाने की कोशिश की, लेकिन अधिकांश ने अपने उम्मीदवारों के खिलाफ दर्ज मामलों को ‘राजनीति से प्रेरित’ बताकर खारिज कर दिया.

पार्टी-वार ब्रेक-अप

केवल गंभीर नहीं, बल्कि अगर सभी आपराधिक मामलों का हिसाब देखें, तो समाजवादी पार्टी के 28 में से 21 (75 प्रतिशत) उम्मीदवारों का ऐसा इतिहास है, जबकि सहयोगी राष्ट्रीय लोक दल के 29 में से 17 (59 प्रतिशत) उम्मीदवार ऐसे हैं. जहां तक बीजेपी का सवाल है, जांच किए गए उसके 51 प्रतिशत (57 में से 29) उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं.

कांग्रेस की बात करें तो आपराधिक रिकॉर्ड्स वाले उम्मीदवारों की संख्या 36 प्रतिशत है (58 में से 21), जबकि बीएसपी में ये 34 प्रतिशत (56 में से 19) और आम आदमी पार्टी में 15 प्रतिशत (52 में से 8 उम्मीदवार) है.

सभी पार्टियों में आपराधिक रिकॉर्ड वाले कुल उम्मीदवारों में 30 पर हत्या के प्रयास के आरोप हैं, जबकि छह के खिलाफ हत्या के आरोप लंबित हैं. बारह उम्मीदवारों पर महिलाओं के खिलाफ अपराध दर्ज हैं, जिनमें से एक बलात्कार का आरोपी है.

बुधवार को एडीआर ने एक बयान में कहा, ‘उम्मीदवारों द्वारा की गई घोषणाओं के अनुसार (पहले दौर के लिए जिनके हलफनामे दाखिल हो चुके हैं और एडीआर जिनका विश्लेषण कर चुका है), एसपी के 61 प्रतिशत, आरएलडी के 52 प्रतिशत, बीजेपी के 39 प्रतिशत, कांग्रेस के 19 प्रतिशत, बीएसपी के 29 प्रतिशत और आप के 10 प्रतिशत उम्मीदवारों ने घोषित किया है कि वो गंभीर अपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं’.

केवल 12 उम्मीदवार महिलाएं हैं. 49 प्रतिशत उम्मीदवार ग्रेजुएट्स हैं.

विश्लेषण में आगे कहा गया कि पार्टियों द्वारा मैदान में उतारे गए तकरीबन 46 उम्मीदवारों ने, एक करोड़ से अधिक की संपत्ति घोषित की है. उसमें कहा गया कि इस श्रेणी में सबसे अधिक संख्या, बीजेपी और आरएलडी उम्मीदवारों की है.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘बीजेपी के 57 में से 55 (97 प्रतिशत), आरएलडी के 29 में से 28 (97 प्रतिशत), बीएसपी के 56 में से 50 (89.3 प्रतिशत), एसपी के 28 में से 23 (82 प्रतिशत), कांग्रेस के 58 में से 32 (55 प्रतिशत) और आप के 52 में से 22 (42 प्रतिशत) उम्मीदवार इसी श्रेणी में आते हैं.

निष्कर्षों के अनुसार, तीन सबसे अमीर उम्मीदवार हैं- अमित अग्रवाल (बीजेपी, मेरठ कैंट) जिनकी घोषित संपत्ति 148 करोड़ है, एसके शर्मा (बीएसपी, मथुरा) जिनकी घोषित संपत्ति 112 करोड़ है और राहुल यादव (एसपी, सिकंदराबाद) जिनकी संपत्ति 100 करोड़ है.

पार्टियों ने आरोपों को खारिज किया

लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने अपने उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक आरोपों को ‘राजनीति से प्रेरित’ बताकर खारिज कर दिया है और दावा किया कि ये आरोप उनके चरित्र को नहीं दर्शाते.

एसपी के मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने दिप्रिंट से कहा कि उनकी पार्टी के उम्मीदवारों के खिलाफ दर्ज बहुत से मामले, योगी आदित्यनाथ की बीजेपी सरकार के राज में दर्ज किए गए थे. उन्होंने कहा, ‘खुद हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सभाओं के लिए सीआरपीसी की धारा 144 के उल्लंघन के आरोपों का सामना किया है’.

आरएलडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मोहम्मद इस्लाम ने ‘प्रेरित’ अपराधिक मामलों पर एसपी के विचारों का समर्थन किया और आगे कहा कि उम्मीदवारों के लिए ‘करोड़पति’ या आर्थिक रूप से संपन्न होना सामान्य बात है. उन्होंने कहा, ‘हमारी पार्टी उसी को टिकट देती है जो योग्य होता है. उसने गरीब उम्मीदवारों को भी टिकट दिए हैं’.

बीजेपी प्रदेश प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि सिर्फ मामले दर्ज हो जाने का कोई मतलब नहीं है और आपको जांच करनी चाहिए कि क्या आरोप तय किए गए हैं. उन्होंने कहा, ‘किसी उम्मीदवार के खिलाफ दर्ज अपराधिक मामलों की संख्या, उसके चरित्र को प्रतिबिंबित नहीं करती. ये रिपोर्ट्स सही तस्वीर सामने नहीं रखतीं, क्योंकि कई मामलों में ये जांच करने की ज़रूरत होती है कि क्या आरोप तय किए गए हैं और केस में क्या प्रगति हुई है’.

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